Let the dawn of Compromises begin!

Turning some lost pages of life, I found these lines bearing the sigh of what is called ‘Compromise’! Something that we could have done, would have achieved or should have struggled for, is what is left, when we look at the compromises we make each day. Before publishing this blog, I thought to translate this piece from Hindi to English to make it widely readable but then my inner voice asked, “Wouldn’t that be a Compromise too?”

चल फिर एक समझौते की सुबह शुरू करें…

थोड़ा झुकें, थोड़ा टूटे,
थोड़ा खुद से रूठें,
और खुद ही को मना कर,

चल फिर एक समझौते की सुबह शुरू करें…

ख्वाहिशों की किश्तें,
समझौतों से चुकाएं,
हसरतों की उड़ाने,
तन्हाईयों से काटें,

चल फिर एक समझौते की सुबह शुरू करें…

जब शाम ढलने को आई ,
रात घिरने को छायी,
चाँद की उस धीमी रौशनी में,
चल बैठ कर हिसाब लगायें…
आज किये तो,कितने समझौते किये?

और ये क्या?
हिसाब करते करते फिर सुबह हो आई!
अब क्या?
चल फिर से एक और समझौते की सुबह शुरू करें…

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  1. A. kumar says:

    Very nice

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